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भास्कर ओपिनियन-आमदनी और बचत:कोविड के बाद आख़िर लोगों ने बचत से मुँह क्यों मोड़ लिया? 2 दिन पहले लेखक: नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर

देश में अमीर और अमीर होते जा रहे हैं और गरीब और गरीब। यह परम्परा या चलन वर्षों से है। केंद्र और राज्यों में अब तक कई सरकारें आईं और गईं। कई दलों ने ग़रीबी मिटाने, हटाने या कम करने के वादे को लेकर चुनाव लड़े और जीते भी, लेकिन इस स्थिति में कोई बदलाव नहीं आ पाया।

दरअसल, सरकारों और पार्टियों के नारे अब तक केवल कानफोड़ू शोर बन कर ही रह गए। वास्तविकता में ये राजनीतिक पार्टियाँ और ये सरकारें ग़रीबी मिटाना ही नहीं चाहतीं। कभी उनमें ऐसी इच्छाशक्ति ही नहीं होती, कभी देश की बेलगाम नौकरशाही पैसा असल लोगों तक पहुँचने नहीं देती और कभी अमीर लोग ग़रीबों के हक़ का पैसा खा जाते हैं। इन्कम टैक्स के आँकड़े बताते हैं कि दस लाख से ज़्यादा आय वाले लोगों की संख्या में भारी इज़ाफ़ा हुआ है, जबकि पाँच लाख से कम आय वाले लोगों की ग्रोथ मामूली है।

वास्तविकता में ये राजनीतिक पार्टियाँ और ये सरकारें ग़रीबी मिटाना ही नहीं चाहतीं।
वास्तविकता में ये राजनीतिक पार्टियाँ और ये सरकारें ग़रीबी मिटाना ही नहीं चाहतीं।

दस से बीस लाख आय वाले लोग 24 प्रतिशत बढ़े, जबकि बीस लाख से ज़्यादा आय वाले लोगों की संख्या में 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। दूसरी तरफ़ पाँच लाख से कम आय वाले लोग केवल चार प्रतिशत ही बढ़ पाए। माना जा सकता है कि यह परिपाटी वर्षों से चली आ रही है और इसमें एकदम से भारी परिवर्तन लाना बहुत मुश्किल है।

सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि कोविड के समय के बाद लोगों ने बचत करने की आदत बहुत हद तक कम कर दी है। ऊपर से हमारी केंद्र सरकार ने एक महान काम किया है। दो साल पहले उसने इन्कम टैक्स स्लैब का एक ऐसा विकल्प दिया है जिसमें बचत का कोई फ़ॉर्मूला है ही नहीं। सीधा सा संदेश यह है कि खाओ और उड़ाओ।

केंद्र सरकार ने दो साल पहले इनकम टैक्स स्लैब का एक ऐसा विकल्प दिया है, जिसमें बचत का कोई फार्मूला है ही नहीं।
केंद्र सरकार ने दो साल पहले इनकम टैक्स स्लैब का एक ऐसा विकल्प दिया है, जिसमें बचत का कोई फार्मूला है ही नहीं।

रिश्तेदारी, परिवार और आस- पड़ोस के कई लोगों को कोविड के समय प्राण देते देखने वाले भोले- भाले लोगों को वित्त मंत्री का यह स्लैब पसंद भी आया होगा। क्योंकि कोविड काल ने लोगों को यह समझाया कि जो है वह आज और अभी ही है। कल का कोई भरोसा नहीं है। हो सकता है इसी कारण अपना और परिवार का पेट काटकर बचत करने की आदत से लोगों ने मुँह मोड़ लिया होगा!

इस तरह की मानसिकता चाहे वो जिस वजह से भी आई हो, उसमें सुधार की ज़रूरत है। क्योंकि कोविड से ही हमें यह सीख भी मिली है कि स्वास्थ्य ही सर्वोपरि है और स्वास्थ्य को अच्छा बनाए रखने के लिए बचत बेहद ज़रूरी है। बीमारियों का आख़िर किसको पता होता है कि कब कौन सी बीमारी आ जाए। बचत करेंगे तो मुश्किल समय में काम आएगी। बचत ही नहीं की जाएगी तो मुश्किल समय में कौन काम आएगा। कोई नहीं आगे आता। इस दौर में ज़्यादातर लोग सुख के साथी होते हैं। दुख का साथी बड़ी मुश्किल से मिल पाता है।

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