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8 साल बाद ढूंढ निकाली बेटे को कुचलने वाली कार:पिता बोले- पुलिस ने केस बंद किया, 5 बार कोर्ट गया, पर हारा नहीं

‘उस दिन अमित स्कूल से लौट रहा था। मेरे भाई सतेंद्र भी साथ थे। पीछे से बहुत तेज स्पीड में एक कार आई और अमित को टक्कर मारते हुए निकल गई। हॉस्पिटल ले जाते वक्त उसकी सांसें टूट गईं। सतेंद्र ने टक्कर मारने वाली कार के आखिरी चार नंबर 2690 देख लिए थे। ये नंबर और कार का टूटा रियर व्यू मिरर बस मेरे पास था। इसी के सहारे 8 साल तक कार ढूंढता रहा। पुलिस ने तो केस क्लोज कर दिया था। अब कोर्ट ने दोबारा जांच का ऑर्डर दिया है।’

ये आपबीती जितेंद्र चौबे की है। 5 जून 2015 को उनके छोटे बेटे अमित का एक्सीडेंट हुआ था। इसके बाद के 8 साल जितेंद्र की लंबी लड़ाई के हैं। वे थाने और कोर्ट के चक्कर काटते रहे, बेटे को टक्कर मारने वाली कार खोजते रहे, पुलिस की अनदेखी बर्दाश्त करते रहे, पर हारे नहीं। बेटे का केस लेकर 5 बार कोर्ट गए।

अमित की मां संध्या और पिता जितेंद्र। ये परिवार गुरुग्राम के वजीराबाद में किराए के मकान में रहता है।
अमित की मां संध्या और पिता जितेंद्र। ये परिवार गुरुग्राम के वजीराबाद में किराए के मकान में रहता है।

आखिर में कोर्ट ने पुलिस से कहा कि वो फिर से मामले की जांच करे। साथ ही कहा कि अगर राज्य की जांच एजेंसी और पुलिस प्रशासन में एक नागरिक का विश्वास बहाल नहीं किया जाता है, तो अदालत अपने कर्तव्य में नाकाम होगी।

कोर्ट के फैसले के बाद दैनिक भास्कर जितेंद्र चौबे के घर पहुंचा। उनसे 8 साल की पूरी कहानी सुनी। जितेंद्र भी तारीखों के साथ सब बताते रहे।

मेरे अंदर जुनून था कि जिस कार ने बेटे को कुचला था, उसे पकड़ना है
अमित की मौत हुई, तब उसकी उम्र सिर्फ 15 साल थी। वो 10वीं में पढ़ता था। गुरुग्राम के सेक्टर-55 में उसका स्कूल था। पुलिस ने सबूत न होने की बात कहकर केस बंद कर दिया। यहीं से जितेंद्र की लड़ाई शुरू हुई। जितेंद्र एक स्कूल में गाड़ी चलाते हैं। परिवार में पत्नी, बेटा और बहू हैं।

जितेंद्र कहते हैं, ‘बीते 8 साल बहुत परेशानी में गुजरे। बीवी बीमार हो गई, पुलिस ने केस बंद कर दिया, बार-बार कोर्ट जाना पड़ा, पैसों की तंगी रही, लेकिन मैंने हार नहीं मानी। मेरे अंदर जुनून था कि जिस कार ने बेटे को कुचला है, उसे पकड़ना है।’

एक्सीडेंट का CCTV फुटेज नहीं, बस रियर मिरर और कार का एक स्टिकर
बेटे की मौत के मामले में पुलिस ने भले हाथ खड़े कर दिए थे, लेकिन जितेंद्र आरोपी को आसानी से निकलने नहीं देना चाहते थे। उन्होंने खुद उसकी तलाश शुरू की। जितेंद्र कहते हैं, ‘इस घटना का CCTV फुटेज नहीं था, पर दो बड़े सबूत मौके पर ही छूट गए थे- कार का साइड व्यू मिरर और DDiS का लोगो। इन्हीं दो चीजों से मैंने कड़ी से कड़ी जोड़ना शुरू किया।’

‘साइड मिरर पर एक नंबर लिखा था। वो नंबर लेकर मैं बिनौला में कार के पार्ट्स बनाने वाली कंपनी में गया। वहां पता चल गया कि ये मिरर यहीं बना था। कंपनी वालों ने बताया कि इस नंबर के मिरर 31 जुलाई 2014 को बने थे। 6 अगस्त 2014 को इसे मानेसर मारुति प्लांट डिस्पैच किया था।’

‘मैं मानेसर प्लांट गया। वहां ये तो पता नहीं चला कि मिरर किस चेसिस नंबर की कार में लगा है, लेकिन उन्होंने पूरे लॉट की कारों की लिस्ट दे दी। इन्हीं में से किसी एक कार में ये मिरर लगा था।’

‘कार का नंबर 2690 मेरे पास पहले से था। मारुति कंपनी से मिली लिस्ट में ये नंबर ढूंढा, तो उस कार का चेसिस नंबर मिल गया, जिसमें मिरर लगाया गया था। चेसिस नंबर से मैंने कार के RTO रजिस्ट्रेशन नंबर का पता लगाया।’

‘RTO से एक कार का पता चला, उसका आखिरी नंबर 2690 था। ये कार ज्ञानचंद के नाम पर रजिस्टर्ड थी। कार का मॉडल स्विफ्ट DVI था। मैंने मारुति सुजुकी के मैनेजर कर्नल रवि बेदी और विजयवीर सिंह से जानकारी मांगी। उन्होंने बताया कि ये कार सेक्टर-34 में बेची गई थी।’

‘मैं सेक्टर-34 में मारुति के सर्विस सेंटर गया। वहां कार की डिटेल मिली। मैं सारी जानकारी लेकर पुलिस के पास गया, लेकिन उन्होंने केस ओपन नहीं किया। मैंने 2016, 2017, 2018 और 2019 में कोर्ट में केस फाइल किया। पिटीशन खारिज होती रहीं। आखिर में जज साहब ने 31 जुलाई 2023 को जांच के आदेश दिए और 31 अक्टूबर 2023 को कार पकड़ में आ गई। ये वही कार थी, जिसकी बात मैं कर रहा था।’

एक्सीडेंट वाली जगह मिले सबूत, जिनकी मदद से जितेंद्र ने बेटे को टक्कर मारने वाली कार की तलाश की।
एक्सीडेंट वाली जगह मिले सबूत, जिनकी मदद से जितेंद्र ने बेटे को टक्कर मारने वाली कार की तलाश की।

पुलिस ठीक से जांच करती, तो केस पहले ही सॉल्व हो जाता
जितेंद्र कहते हैं, ‘केस में पुलिस ने बहुत लापरहवाही की, नहीं तो ये पहले ही सॉल्व हो जाता। मैंने एक्सीडेंट के बाद सेक्टर-56 के थाने में FIR लिखवाई थी। तब SI जगदीश ने केस दर्ज किया था।’

‘मैंने पुलिस को दोनों सबूत कार का रियर व्यू मिरर और DDiS का स्टिकर दिया था। पुलिस ने इतने जरूरी सबूत एक घंटे बाद लौटा दिए। कहा कि ये पार्ट और अधूरे नंबर से कार का पता नहीं कर सकते। पुलिस ने चश्मदीद की बात भी FIR में दर्ज नहीं की।’

जितेंद्र कहते हैं, ‘इसके बाद भी मैं थाने जाता रहा, ये सोचकर कि बेटे की मौत के आरोपी का कुछ तो पता चलेगा। हालांकि, पुलिस ने 8-9 महीने बाद केस बंद कर दिया। मैं केस की स्टेटस रिपोर्ट के लिए कोर्ट चला गया। तब पुलिस ने बताया कि केस डिसमिस हो गया है।’

‘इसके बाद 2017 में मैंने पुलिस की जांच पर सवाल उठाते हुए प्रोटेस्ट पिटीशन दायर की। इसके बाद केस दोबारा शुरू हुआ। अब ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट विक्रांत ने फिर से केस की जांच करने के लिए कहा है।’

आरोपी ज्ञानचंद से कभी मुलाकात हुई? जितेंद्र कहते हैं, ‘अगर ज्ञानचंद मुझसे आकर मिल लेता, कहता कि गलती हो गई, तो मुझे 8 साल धक्के नहीं खाना पड़ता। वो भी पुलिस के बल पर चुपचाप बैठा रहा।’

हमने ज्ञानचंद के बारे में जानकारी जुटाई, तो पता चला कि उनका घर हरियाणा के बादशाहपुर में है। उनसे बात करने की कोशिश की, लेकिन कॉन्टैक्ट नहीं हो पाया।

केस के दौरान परिवार से कैसा सपोर्ट मिला? जितेंद्र बताते हैं, ‘परिवार कहता था कि अगर कार पकड़ी नहीं जाती, तो उसे छोड़ दीजिए, लेकिन मेरे अंदर एक जुनून था कि उसे पकड़ना है और मैंने ये करके दिखाया। अब मैं कोर्ट से रिक्वेस्ट करता हूं कि आरोपी को कड़ी सजा दे।’

जितेंद्र की पत्नी संध्या उनके बगल में बैठी थीं। बीच-बीच में बेटे को याद कर रोने लगती हैं।

संध्या कहती हैं, ‘मुझे बस यही कहना है कि एक्सीडेंट में किसी से भी गलती हो सकती है, लेकिन जिसे चोट आई हो, उसे रास्ते पर छोड़कर नहीं भागना चाहिए। अगर कार वाला मेरे बच्चे को अस्पताल ले जाता, तो शायद वो जिंदा होता। लोगों को भी ऐसे मामलों में गाड़ी वाले को पीटना नहीं चाहिए। इसी डर से गाड़ी वाले भागते हैं।’

वकील बोले- ये केस पुलिस का फेलियर
केस के बारे में हमने जितेंद्र के वकील संजय संधू से भी बात की। वे बताते हैं, ‘कार का साइड मिरर और स्टिकर एक्सीडेंट वाली जगह पर मिला था, लेकिन पुलिस ने कहीं भी अपने रिकॉर्ड में दोनों चीजें मेंशन नहीं की थीं।’

‘पुलिस ने कुछ समय बाद चुपके से क्लोजर रिपोर्ट लगा दी। पीड़ित पुलिस के चक्कर लगाता रहा, प्रोटेस्ट पिटीशन फाइल करता रहा। अब मामले में चार्जशीट फाइल हो गई है। हम जल्द आरोपी से हर्जाने की मांग करेंगे।’

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